पॉर्ट-2.

रायपुर. छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी इलाके को कालांतर से ही प्रयोगशाला समझा जाता है.जो कोई भी इस इलाके में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता हैं, प्रयोग करना प्रारंभ कर देता है. अफसर आते हैं तो आदिवासियों के देसी मुर्गें को गटककर कड़कनाथ नस्ल को बगीचे में उगाने की सलाह देने लगते हैं. कोई नीलगिरी का पेड़ लगाकर दावा करता है कि बस…अब- तब में पेड़ से शहद टपकने लगेगा और काजू गिरने लगेगा.

नीलगिरी के पेड़ से काजू….वाह भाई वाह. मतलब यह कि जिसकी जैसी मर्जी होती हैं वह करते चलता हैं. बहरहाल धुर नक्सलवाद से प्रभावित इस आदिवासी इलाके में बंटी-बबली…अनुदान के जरिए एक भव्य पुस्तक मेला लगाने की तैयारी कर रहे हैं. इस मेले के लिए भारी-भरकम आर्थिक सहयोग देने का मन बना चुके प्रशासन के अफसरों को शायद यह नहीं मालूम होगा कि आयोजनकर्ता बंटी और बबली ने मेले में जिन बड़े-बड़े लेखकों को आमंत्रित किया है उनमें से अधिकांश को पता ही नहीं है उन्हें छत्तीसगढ़ कब आना है और क्यों आना है ? बंटी-बबली ने सूची में देश के कई बड़े लेखकों का नाम शामिल तो कर दिया हैं, लेकिन उन सभी से किसी तरह की कोई स्वीकृति नहीं ली गई है. एक लेखिका जो पिछले कुछ दिनों से अमेरिका में हैं उसका नाम भी आमंत्रितों की सूची में शामिल कर दिया गया है. और तो और सूची में एक दर्जन से ज्यादा ऐसे लेखकों और सृजनकर्मियों के नाम शामिल किए गए हैं जो संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं.

कुछ शुद्ध किस्म के कलावादी हैं जिनका झुकाव दक्षिणपंथ की तरफ हैं तो कुछ ऐसे भी लेखकों भी बुलाया गया हैं जो सीधे-सीधे संघ की विचारधारा को पल्लवित और पोषित करने का काम करते हैं. प्रदेश का एक सेवानिवृत्त अफसर जो हमेशा से खाकी निक्कर गैंग को बढ़ावा देता रहा हैं उसने पिछले साल ही बंटी-बबली के गैंग को ज्वाइन किया है. इस अफसर ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद संविदा पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, लेकिन सरकार में बैठे कुछ समझदार लोगों की वजह से अफसर के मसूंबों पर पानी फिर गया. यह अफसर पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की बात तो करता है, लेकिन निक्कर विचारधारा से ओतप्रोत पुस्तकों की संस्कृति को. बताते हैं कि यह सेवानिवृत्त संघी अफसर भी बंटी-बबली के साथ आदिवासी इलाके में सक्रिय हैं. बाकी छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ फेसबुक पर लिखकर खुद को तुर्रमखां समझने वाला नन्हा जासूस बबलू तो जी जान से लगा ही हुआ है. खबर है कि मेले में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाले कई बड़े प्रकाशकों ने इंकार कर दिया है. इसके बाद बंटी-बबली ने प्रकाशकों को बुलाने के लिए हैदराबाद का रुख किया है. हैदराबाद से याद आया कि अरसा पहले इसी आदिवासी इलाके में जहां अब पुस्तक मेला होने जा रहा है वहां एक बुक डिपो के मालिक ने पुस्तक मेला आयोजित किया था. जब पुस्तक मेले में हैदराबाद से प्रकाशित नक्सली साहित्य की बिक्री होने लगी तो जमकर हंगामा मचा. हो-हंगामे के बाद आयोजनकर्ता को थाने में बिठा दिया गया था.जानकारों का मानना है कि विघ्नसंतोषियों और संघियों के जमावड़े से इस पुस्तक मेले में भी बवाल कटना तय है. राज्य अभी कालीचरण के तमाशे को नहीं भूल पाया है.जो बवाल होगा उसकी जवाबदारी किसकी होगी ? किस अफसर पर गाज गिरेगी…गिरेगी भी या नहीं ? फिलहाल यह साफ नहीं है. सब कुछ समय के गर्भ में हैं.

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