बंटी-बबली और पुस्तक मेला.

‘राजकुमार सोनी’

हर फील्ड में बंटी और बबली होते हैं. छत्तीसगढ़ में भी एजुकेशन के फील्ड में कार्यरत एक जोड़ी पति-पत्नी को बंटी और बबली कहा जाता है.दरअसल इनका असली नाम तो कुछ और ही हैं… लेकिन देश और राज्य के भुक्तभोगी लेखकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों के बीच इनकी प्रसिद्धि बंटी-बबली के तौर पर ही बनी हुई हैं.

अब आप सोच रहे होंगे कि जिस बंटी-बबली का जिक्र यहां हो रहा है क्या ये लोग भी ताजमहल बेचने के खेल में लगे हुए हैं. हालांकि इन लोगों ने अभी तक ताजमहल की तरफ आंख उठाकर नहीं देखा है, लेकिन तय हैं कि जिस रोज़ भी ताजमहल के आसपास कुछ शैक्षणिक गतिविधियां प्रारंभ हो जाएगी उस रोज़ ताजमहल की ईंट से ईंट बिक जाएगी. जैसा कि मैंने आपको बताया है कि इनकी फील्ड एजुकेशन से जुड़ी हुई हैं.

बहरहाल छत्तीसगढ़ में कार्यरत बंटी-बबली की जोड़ी पुस्तक मेले का आयोजन करवाती हैं. गत दो साल से इनके साथ कुछ धुरंधर लोग जुड़े थे, लेकिन जैसे-जैसे लोग-बाग बंटी-बबली के कारनामों से वाकिफ होते गए वैसे-वैसे अलग होते गए.

यदि कोई इनके कारनामों पर अपनी असहमति या आपत्ति दर्ज करता है तो ये लोग आपके दिमाग में दही जमा सकते हैं. बेहद मासूमियत के साथ उनका जवाब होता है- आप लोग पुस्तक संस्कृति का विरोध करते हो.आप लोग नहीं चाहते कि पुस्तकें बिके.आप लोग इस राज्य के लोगों को पढ़ने-लिखने से रोकना चाहते हो. वगैरह-वगैरह.

अरे महोदय और महोदया… मोदी के विचारहीन भक्त और लंपट समुदाय को छोड़ दें तो शायद ही कोई ऐसा होगा जो किताबों से नफरत करता होगा. कोई भी किताबों से नफरत नहीं करता. कम से राज्य का समझदार और पढ़ा-लिखा इंसान तो बिल्कुल भी किताबों नफरत नहीं करता. लोगों की आपत्ति पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने को लेकर नहीं ब्लकि बंटी-बबली के तौर-तरीकों से हैं.

जो लोग आपसे जुड़े थे उन लोगों ने देखा है कि आप लोग किस तरह से दूर-दराज से आए हुए लेखकों और साहित्यकारों का अपमान करते हैं.

मुझे याद हैं पुस्तक मेले में देश के एक नामचीन पत्रकार की पत्नी जो स्वयं भी बहुत बड़ी लेखिका है वह रायपुर आई थीं. जब वह रायपुर एयरपोर्ट पहुंची तो वहां उन्हें कोई रिसीव करने वाला नहीं था.जैसे-तैसे लेखिका टैक्सी लेकर होटल पहुंची तो होटल वाले ने कह दिया- मैडम…चाय-पानी-भोजन का चार्ज अलग से देना होगा. मैडम ने पुस्तक मेले पहुंच कर आयोजन कमेटी से जुड़े लोगों के सामने अपनी पीड़ा बताई थीं. यह पीड़ा केवल लेखिका की नहीं थीं. बहुत से लेखक, साहित्यकार ऑटो रिक्शा और रिक्शा लेकर इधर-उधर भटकते पाए गए थे.

छत्तीसगढ़ के कुछ साहित्यकार कड़कड़ाती ठंड में मेले के भारी-भरकम मंच ( जिसके सामने दो-चार श्रोता ही होते थे ) वहां पर कविता पढ़ने पहुंचे थे. वहां किसी ने चाय के लिए भी नहीं पूछा. एक साहित्यकार ने आयोजकों को गरियाते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिख मारी थीं कि किस तरह से उनका अपमान हुआ है.

देश के एक बड़े कथाकार उद्घाटन समारोह के दिन पहुंचे थे. जब उन्होंने मंच के सामने दो-चार श्रोताओं और पांच-छह सौ खाली कुर्सियों को देखा तो उनकी आत्मा चीत्कार उठी थीं. उन्होंने भरे मंच से कहा-मैं शीत से भरी हुई खाली कुर्सियों को प्रणाम करता हूं. यह खबर एक स्थानीय अखबार में इसी शीर्षक के साथ प्रकाशित भी हुई थीं.

पिछली बार देश की एक नामचीन लेखिका जो छत्तीसगढ़ में ही निवास करती हैं वह भी गलती से बंटी-बबली से जुड़ गई थीं. उनका अनुभव भी बेहद खराब रहा. एक बैठक में उन्होंने बंटी से यहां तक कह दिया था- तुम्हारी प्रवृत्तियों की वजह से सब लोग कट गए हैं. ज्यादा बात मत करो…नहीं तो झापड़ खा जाओगे. दरअसल हुआ यूं था कि पिछली बार कोरोना काल में जब सही ढंग से किताबों की बिक्री नहीं हुई. प्रकाशकों ने स्टाल का किराया कम करने को कहा तो आयोजक ने प्रकाशकों को बंधक बना लिया.जब तक पाई-पाई का हिसाब नहीं कर लिया गया तब तक किसी को भी छोड़ा नहीं गया. आयोजकों की इस हरकत से नाराज दिल्ली के कुछ प्रकाशकों ने एक लिखित शिकायत मुख्यमंत्री के पास भेजी थीं.

साहित्यिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ राज्य एक प्रतिष्ठित पत्रकार भी कुछ समय तक बंटी-बबली से जुड़ा हुआ था, लेकिन जल्द ही उसने बंटी-बबली के व्यवहार से त्रस्त होकर खुद को अलग कर लिया. पिछली बार के पुस्तक मेले को सफल बनाने के लिए इस पत्रकार ने जी-जान लगा दिया था, लेकिन उसका अनुभव भी बेहद खराब रहा.अगर कोई इस पत्रकार के खराब अनुभव को सुनकर कुछ अच्छा-बुरा समझने की इच्छा रखता है उसे मोबाइल नंबर उपलब्ध करवाया जा सकता है. पिछले साल पुस्तक मेले की एक हैरतअंगेज घटना यह भी थीं कि एक लेखक की पुस्तक का विमोचन करवाने के लिए आयोजक ने एक लाख रुपए हड़प लिए थे. धर्मेंद्र टाइप की टोपी पहनने वाले एक फिल्मी कलाकार को बुलाया गया. कलाकार आया और विमोचन करके चलते बना… लेकिन लेखक को जबरदस्त सदमा लगा और फिर कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई. चंद रोज़ पहले एक अखबार के संपादक के साथ छत्तीसगढ़ के कुछ साहित्यकार अंडमान की यात्रा पर गए थे. इस यात्रा में प्रत्येक सदस्य को टिकट व अन्य व्यवस्थाओं के लिए कुछ राशि का भुगतान करना था. इस यात्रा में जैसे-तैसे बंटी-बबली भी शामिल हो गए.संपादक को सबने अपने हिस्से का भुगतान कर दिया है…केवल बंटी-बबली को छोड़कर. अब संपादक फोन लगा-लगाकर परेशान है. एक बार संपादक बकाया पैसों को हासिल करने लिए बंटी-बबली के घर भी जा चुका है…मगर घर के बाहर ताला लटका मिलता है और कमरे के भीतर से किसी डरावने टाइप के कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आती हैं.

देश के किसी भी हिस्से में होने वाला पुस्तक मेला सुधि पाठकों और अच्छे साहित्य में रुचि रखने वाले साहित्यिक जनों के लिए होता है, लेकिन मेले की आड़ में जब सारी सीमाओं से परे जाकर घर भरने वाली धंधेबाजी होने लगती है तो स्थिति विस्फोटक होती जाती है. दूर-दराज के लेखक जब अपने-अपने ठिकानों पर पहुंचकर इधर-उधर की गोष्ठियों में शिरकत करते हैं तो फिर छत्तीसगढ़ के खराब अनुभव को लेकर तरह-तरह की चर्चा करते हैं. पिछली फासिस्टवादी सरकार के समय यह बदनामी स्वाभाविक ढंग से हुआ करती थीं. पाठकों को याद होगा कि भाजपा सरकार के समय जनसंपर्क विभाग ने एक भव्य साहित्यिक मेला करवाया था. लेखकों से दोयम दर्जे के व्यवहार के चलते पूरा आयोजन विवादों में घिर गया था. लेखकों ने सभी स्तरों पर बेढंगे साहित्यिक आयोजन की आलोचना की थीं. देश की अमूमनन हर पत्र- पत्रिका में आयोजन को लेकर लेखकों का गुस्सा देखने को मिला था. छत्तीसगढ़ में अब फासिस्टवादियों की सरकार नहीं है.अब सरकार में बौद्धिक और समझदार लोगों की टीम मुस्तैदी से काम कर रही है तो सतर्कता के साथ बंटी और बबली जैसी प्रवृति रखने वाले लोगों को चिन्हित करने की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है. बंटी-बबली के साथ संघ की विचारधारा को पल्लवित और पोषित करने वाला एक पूर्व अफसर भी जुड़ा हुआ है. एक नन्हा जासूस बबलू भी जोरदार ढंग से सक्रिय है. ये वहीं बबलू है जो अपने फेसबुक में हर दूसरे दिन छत्तीसगढ़ सरकार के बारे में तथ्यों से परे जाकर अनाप-शनाप पोस्ट करते रहता है.

अभी हाल के दिनों में देश के बहुत से प्रकाशकों ने दिल्ली में आयोजित होने वाले पुस्तक मेले से यह कहकर हाथ खींच लिया है कि आयोजकों ने स्टाल का रेट बढ़ा दिया है. बहुत से लेखकों ने इसलिए भी दिल्ली के पुस्तक मेले में जाना स्थगित कर दिया क्योंकि वहां भी उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होने लगा था. बहरहाल छत्तीसगढ़ के बंटी और बबली इन दिनों एक आदिवासी इलाके में पुस्तक मेले का आयोजन करने के लिए जुटे हुए हैं. उन्हें उम्मीद है कि शासन और प्रशासन से तगड़ा अनुदान मिल जाएगा. वे अब तक सारे मेले-ठेले अनुदान हासिल करने के लिए ही तो करते आए हैं. सारे खेल के पीछे शासकीय अनुदान ही है. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं रहता कि साहित्यकार सम्मानित होता है या अपमानित. वे अपना काम बनता तो भाड़ में जाय जनता…मुहावरे को चरितार्थ करते हुए बेहद निर्विकार भाव से चलते रहते हैं. राजधानी के अमूमन सारे अच्छे लेखकों की ओर से किनारा कर लिए जाने के बाद बंटी और बबली आदिवासी क्षेत्र में जबरदस्त ढंग से सक्रिय है. खबर है कि पुस्तक मेला करने को लेकर कुछ लेखकों के साथ दो-तीन बैठकें भी हो चुकी है. अब आदिवासी इलाके के लेखकों को यह तो नहीं मालूम है कि बंटी और बबली किस बला का नाम है ? जब पता चलेगा…सिर पीटेंगे. बंटी-बबली का क्या है, वे तो किसी नए इलाके का रुख कर लेंगे. ऐसा कोई सगा नहीं जिसको बंटी-बबली ने ठगा नहीं….जय हो.

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