'मठाधीश या सीएम, योगी की दोहरी शपथ कैसे'....

'मनोज शर्मा'

बिलासपुर. मठाधीश बनने के लिए धर्म रक्षा की शपथ लेनी पड़ती है और सत्ता के शीर्ष यानी मुख्यमंत्री बनने के लिए संविधान की शपथ ली जाती है जिसके मूल में धर्म निरपेक्षता यानी सेक्यूलरिज्म है। इसका मतलब संत और सत्ता दो अलग अलग नाव हैं, जिनकी एक साथ सवारी नहीं की जा सकती। इसी कड़ी में सबसे बड़े और सियासत में अहम स्थान रखने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को लेकर ज्योर्तिमय पीठ के शंकराचार्य स्वामि अविमुक्तेश्वरानंद ने सत्ताधीश या मठाधीश की बहस आम जनमानस में छेड़ दी है। इससे साफ संदेश जा रहा है कि एक सच्चा संत कैसे सत्ता के गलियारे में रह सकता है। दोनों पदों पर शपथ लेने का मतलब ही है कि उनकी कोई एक शपथ तो झूठी है। फिर सारी मोहमाया, घर परिवार छोडक़र संत बनने वाला सत्ता का दलदल कैसे अपना सकता है।




यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ असल मेें नाथ सम्प्रदाय के कनफटा संत हैं। गोरखनाथ पीठ (गोरखपुर) के मठाधीश बनने से पहले उनका नाम अजय कुमार विष्ट था। नाथ सम्प्रदाय की दीक्षा लेने के बाद गुरू शिष्य परंपरा से मंहत अवैध नाथ के उत्तराधिकारी के रूप में वर्ष 2014 में वे इस मठ के मठाधीश या यूं कहें कि पीठाधीश्वर बन गए। पाटाभिषेक के दौरान धार्मिक रूप से उन्होंने अनौपचारिक शपथ ली थी जिसमें गुरू और नाथ परंपरा के प्रति निष्ठा, मठ की सेवा और धर्म रक्षा का संकल्प, ब्रम्हचर्य, साधना और अनुशासन का पालन करना शामिल था। यह सब एक गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया का हिस्सा था जो परंपरा संत गुरू गोरखनाथ एवं उनके गुरू मच्छिंद्रनाथ के समय से चली आ रही थी। इतना ही नहीं नाथ संप्रदाय की सबसे प्रसिध्द दीक्षा कान फाड़ दीक्षा भी योगी आदित्य नाथ ने ली है जिसमें उनके कान के बीच वाले हिस्से को विशेष विधि से छेद कर कुंडल (मुंदर) पहनाए गए हैं।

इस तरह सम्पूर्ण मोह माया और नश्वर संसार को छोडक़र वे पूरी तरह नाथ संप्रदाय को ग्रहण कर चुके हैं। इसके लिए उन्हें कुछ नियम भी पालन करने होते हैं, जैसे गुरू भक्ति, योग और ध्यान, संयमित जीवन, ब्रम्हचर्य और नाथ सम्प्रदाय की सेवा है। अब सवाल यहीं से शुरू होते हैं कि इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते क्या उन्हें इसके लिए समय और संत के अनुकूल वातावरण मिल पाता होगा। नहीं, हर्गिज नहीं। क्योंकि सत्ता और सियासत तो साम दाम दंड भेद से चलती है और इसमें इतनी दुनियादारी होती है कि धर्म कर्म के लिए समय ही नहीं निकल पाता होगा। इतिहास गवाह है कि अनेक बड़े राजा महाराजा इन्हीं कारणों से सत्ता के दलदल से निकल कर परम आनंद की प्राप्ति के लिए संत बने और लोगों ने उन्हें सिर माथे पर बिठाकर सम्मान दिया। लेकिन संत बिरादरी से सत्ता के गलियारे में पहुंचने का बिरला उदाहरण यूपी में ही सामने आया है।


पीठाधीश्वर के रूप में धर्म रक्षा की शपथ लेने वाले योगी आदित्य नाथ ने वर्ष 2017 में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के लिए संविधान की शपथ ली। ऐसा दूसरी बार सीएम बनने के समय भी किया। इससे पहले पांच बार जब सांसद रहे तब भी पद गोपनियता के लिए संविधान की शपथ ली। जबकि संविधान के मूल में है धर्म निरपेक्षता। 42 वें संविधान संशोधन में साफ है कि आपको समाजवादी और पंथ निरपेक्ष रहना होगा। इसके अनुच्छेद-14,15,25 एवं 26,28 के तहत आपको सेक्यूलर रहना होगा। वही सेक्यूलर जो उनकी पार्टी के आईटी सेल ने गाली के रूप में स्थापित कर दिया है। खैर, धर्म निरपेक्षता यानी सेक्यूलरिज्म संविधान की मूल संरचना में है। इसके लिए वर्ष 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला दिया जिसमें कहा गया कि संसद भारत के संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन वह संविधान की मूल संरचना नहीं बदल सकती। असल में भारत की पहचान ही सभी धर्माे के प्रति समान व्यवहार पर आधारित है। एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ के मामले में फिर शीर्ष अदालत ने दोहराया कि कोई राज्य सरकार धर्म के आधार पर शासन चलाए तो उसे असंवैधानिक करार दिया जा सकता है। बात यहीं से बिगड़ती है कि सीएम जैसे पद पर बैठे कनफटा योगी को संविधान की शपथ लेकर धर्म निरपेक्ष यानी सेक्यूलर रहना होगा तो फिर गोरखनाथ पीठ पर आप अपने धर्म की रक्षा की शपथ कैसे पूरी करेेंगे। इन दो अलग- अलग नावों की सवारी पिछले ढाई दशक से कैसे कर रहे होंगे। यानी किसी एक शपथ के साथ तो पक्षपात किया होगा, कोई एक शपथ तो झूठी साबित हुई होगी ना।


हां एक बात और क्या इसे लाभ के दो पदों, जैसा मामला नहीं मानना चाहिए। मठाधीश के रूप में आपके रहने, खाने और नाथ सम्प्रदाय की रक्षा के लिए तमाम सुविधाएं दी गई हैं, दूसरी तरफ उत्तप्रदेश सरकार से सरकारी आवास, वेतन- भत्ता पेंशन आदि लेकर योगी सीएम के पद पर भी विराजमान हैं। एक आम आदमी के लिए तो कानूनन व्यवस्था है कि लाभ के दो पद पर नहीं रह सकता। नहीं तो उस पर कानून का डंडा चल जाएगा लेकिन राज्य के मुखिया का क्या। शायद इसी लिए राम राज्य में तुलसीदास जी ने लिखा भी था कि समरथ को नहीं दास गोसाईं।


शंराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि घर, परिवार, नाम समाज समेत तमाम मोह माया छोडक़र संत बनते हैं। इसलिए संत वापस मोहमाया रूपी सत्ता की दलदल में नहीं जा सकते, यह ठीक वैसा ही है जैसे थूक कर उसे चाट लिया जाए। यह कथन इसलिए भी वाजिब है कि संत बनने के बाद परिवार को छोड़ दिया जाता है और जब कभी उनका परिवार सामने आए तो केवल मां के अलावा किसी और का चरण स्पर्श करने की मनाही होती है। लेकिन सत्ता पाने के लिए की जाने वाली सियासत में तो गेरूआ पहनकर भी पार्टी में लाइन से सीनियरों के पांव पडऩे पड़ते हैं। शीश झुकाना ही पड़ता है, इसके बिना कुर्सी नसीब ही नहीं होती। यह सब संत को भला कैसे शोभा देगा। बहुत से लोग इस बात से सहमत हैं कि संत का सत्ता में इसीलिए भी कोई काम नहीं है। साधु संतो को योग तप के साथ धर्म में लीन रहना चाहिए। सनातन धर्म, भारत की पुरानी और व्यापक परम्परा है जिसमें नाथ सम्प्रदाय एक तरह से विशेष योगी परम्परा है। ठीक वैसे ही जैसे दूध में घी। इसलिए ऐसे विशिष्ट परम्परा से योगी आदित्य नाथ का वापिस मोह माया में जाना असरकारी संतों को उचित नहीं लग रहा होगा। क्योंकि सरकारी संतों में गुंडे मवाली और सत्ता के दलालों की लंबी फेहरिश्त है जो भगवा पहनकर सरकारी संत बने घूम रहे हैं, उनके लिए यह वरदान से कम नहीं है। लेकिन समाज के साधारण व्यक्ति को यह सोचना होगा कि उसके धर्म के तमाम साधु संत यदि सत्ता की दलदल में इसी तरह समाते चले गए और सरकारी संत हो गए तो फिर धर्म की रक्षा कौन करेगा। कौन दिशा देगा हिन्दू समाज को। यानी धर्म की रक्षा के लिए भी यह खतरनाक है। इससे भी अहम बात है कि यह राजनीति करने वालों के लिए कम खतरनाक नहीं है। ठीक है भगवा पहनकर अपने धर्म का वोट लेकर आज भाजपा में आप बन गए। लेकिन इसी तरह सदन में मौलाना, पादरी, निहंग आदि आने लगे तब पार्टी चलाने वाले नेताओं का क्या होगा। धीरे धीरे लोगों को ऐसे ही धर्मगुरूओं को राजनीति के लिए चुनने और विधानसभा, लोकसभा में भेजने के लिए वोट देने की आदत पड़ गई तो तब पार्टी लाइन और उसकी नीति- सिध्दांतों का क्या होगा।


फिर तो जन्मजात सियासत करने वाले हाशिए पर आ जाएंगे। शायद इसी लिए कहा जाता है कि धर्म और राजनीति का घालमेल नहीं होना चाहिए। दोनों को अपने अपने क्षेत्रों में काम करना चाहिए। सत्ता और राजनीति का मकसद जनता की मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराकर आसान जीवन देकर इस लोक को सुधारना है। धर्म गुरूओं और मठाधीशों का काम जनता को आध्यात्मिक रूप से समृध्द बनाकर योग तप व्रत पूजा से उनका परलोक सुधारना है।









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