एडवोकेट गुप्ता ने नवीन चावला प्रकरण से कांग्रेस को घेरा, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए सवाल.

• गोपालास्वामी की सिफारिश के बावजूद UPA सरकार ने नहीं हटाया था नवीन चावला को.


• 2009 के घटनाक्रम का हवाला देकर कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप.


रायपुर. चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच वर्ष 2009 का नवीन चावला प्रकरण एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस मामले का हवाला देते हुए कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने नवीन चावला के कथित पक्षपातपूर्ण आचरण को लेकर उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन UPA सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद 21 अप्रैल 2009 को चावला ने देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद संभाला। अब इसी घटनाक्रम के आधार पर कांग्रेस के मौजूदा रुख और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।


गोपालास्वामी की सिफारिश के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई.


वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत नवीन चावला को निर्वाचन आयुक्त के पद से हटाने की सिफारिश भेजी थी। सिफारिश के पीछे चावला के कथित पक्षपातपूर्ण आचरण और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठाई गई आपत्तियों का हवाला दिया गया था।


आरोप था कि चावला ने आयोग की गोपनीय बैठकों और निर्णयों से संबंधित जानकारियां सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेताओं के साथ साझा की थीं। इन आरोपों ने उस समय निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। हालांकि, इन आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय तत्कालीन विवाद और सिफारिश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।


आपातकाल के दौर को लेकर भी उठे थे सवाल.


नवीन चावला का नाम आपातकाल के दौर में उनके प्रशासनिक कार्यकाल को लेकर भी विवादों में रहा। वर्ष 1975 से 1977 के बीच दिल्ली प्रशासन में उनकी भूमिका पर आपातकाल के बाद गठित शाह आयोग ने प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। उनके प्रशासनिक आचरण और कथित अधिकारों के दुरुपयोग को लेकर सवाल उठाए गए थे।


इसके अलावा, चावला और उनके परिवार से जुड़े ट्रस्टों को कांग्रेस शासित राज्यों में भूमि आवंटन तथा वित्तीय सहायता मिलने को लेकर भी राजनीतिक आरोप लगाए गए थे। इन मुद्दों को लेकर तत्कालीन विपक्ष ने सवाल खड़े किए थे। इन विवादों ने उनकी नियुक्ति और निर्वाचन आयोग में उनकी भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज किया था।


UPA सरकार के फैसले पर उठे सवाल.


तत्कालीन UPA सरकार ने गोपालास्वामी की सिफारिश के बावजूद नवीन चावला को पद से हटाने की कार्रवाई नहीं की। इसके बाद 21 अप्रैल 2009 को चावला ने भारत के 16वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला। उनका कार्यकाल जुलाई 2010 तक रहा।


इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर अब कांग्रेस के राजनीतिक रुख पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि जब निर्वाचन आयोग के सर्वोच्च पद पर बैठे अधिकारी ने अपने ही एक सहयोगी निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, तब तत्कालीन सरकार ने उन पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने दिया।


चुनाव आयोग पर मौजूदा बहस में 2009 का संदर्भ.


वर्तमान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर विपक्ष के सवालों के बीच नवीन चावला प्रकरण का हवाला दिया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक दलों को अपने पुराने फैसलों और आचरण का भी मूल्यांकन करना चाहिए।


उनका तर्क है कि सत्ता में रहते हुए एक विवादित नियुक्ति का बचाव करना और विपक्ष में रहते हुए निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना राजनीतिक दोहरेपन की बहस को जन्म देता है। दूसरी ओर, किसी भी मौजूदा निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों का मूल्यांकन भी तथ्यों, साक्ष्यों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए।


संवैधानिक संस्थाओं पर राजनीति कितनी उचित?


नवीन चावला प्रकरण एक बार फिर यह सवाल सामने लाता है कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक दलों का रवैया सत्ता और विपक्ष में रहते हुए अलग-अलग क्यों दिखाई देता है। निर्वाचन आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अहम है। ऐसे में आयोग की निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्यों, पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादाओं के आधार पर दिया जाना चाहिए।


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