नक्सल मुक्त बस्तर की दास्तां: जब माओवादियों ने एक कलेक्टर का किया था अपहरण, 12 दिन की कैद के बाद मध्यस्थों की मदद से मिली थी रिहाई…

रायपुर। आज जब बस्तर नक्सलियों से कमोबेश मुक्त हो चुका है, 14 साल पहले एक ऐसी घटना कौंध जाती है, जब बीहड़ इलाकों में आदिवासियों के बीच बेखौफ आने-जाने वाले आईएएस अधिकारी सुकमा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का माओवादियों ने अपहरण कर लिया था. 12 दिन कैद में रहे. इस दौरान राज्य सरकार की पहल पर मध्यस्थों की बदौलत माओवादियों के चुंगल से बाहर निकल पाए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सु्खियां बटोरने वाली यह घटना एक दौर में बस्तर में माओवादियों की पकड़ की दर्शाती है.


हम बात कर रहे हैं 2006 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी एलेक्स पॉल मेनन की. 2007 में अपने करियर की शुरुआत छत्तीसगढ़ सरकार के अधीन एक IAS अधिकारी के रूप में काम करते हुए मेनन ने अपनी छवि एक ऐसे अधिकारी के तौर पर बनाई, जिसके लिए बस्तर के गांव वालों के हित में काम करना ही सब कुछ था. न उन्हें किसी का भय और न ही किसी सुविधा की जरूरत. सरकारी गाड़ी, अच्छी सड़क और सुरक्षा है तो ठीक नहीं तो बिना सुरक्षा मोटरसाइकिल से ही दुर्गम गांवों में गांव वालों का दुख-दर्द सुनने पहुंच जाते थे.



शादी के सिर्फ तीन हफ्ते ही बीते थे कि धुर नक्सली जिले सुकमा के कलेक्टर के तौर पर तैनाती हो गई. लेकिन अगले दिन ही सामान बांध कर बस्तर पहुंच गए. पिछड़े इलाकों में बेहद गरीब आदिवासी ग्रामीणों के बीच काम करते हुए मेनन के चेहरे पर हमेशा मुस्कान तैरती रहती. तमाम मुश्किलें, अस्थमा की बीमारी, नक्सली अपहरण और हमले की तमाम चेतावनियां से बेपरवाह मेनन का एक ही मकसद नजर आता था गांवों में सरकारी योजनाओं के जरिए विकास पहुंचाना. उन्होंने अपने प्रयास से क्षेत्र के तमाम बंद पड़े स्कूल खुलवा दिए.


लेकिन मेनन की यही सक्रियता माओवादियों को रास नहीं आई. 21 अप्रैल, 2012 को सुकमा जिले के एक गाँव माझीपारा में आयोजित एक बैठक में शामिल होने के लिए पहुंचे मेनन के साथ यात्रा कर रहे दो गार्डों की हत्या कर माओवादियों ने उनका अपहरण कर लिया. माओवादियों ने मेनन की आंखों में पट्टी और कलाइयों में रस्सी बांधकर अंदर जंगल की ओर ले गए. अपहरण की यह खबर आग की तरह रायपुर से दिल्ली तक पहुंच गई. सरकार हरकत में आई और बातचीत की पहल शुरू हुई.

छत्तीसगढ़ सरकार ने सरकारी वार्ताकारों द्वारा की जा रही बातचीत की देखरेख के लिए पाँच सदस्यों वाली एक राजनीतिक समिति बनाई, जिससे वार्ताकार माओवादियों की मांगों पर अपनी प्रतिक्रिया तय करने के लिए इस समिति के पास वापस जा सकें. बंधक बातचीत सही थी और तय मानक-परिचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के अनुरूप थी.

आखिरकार मध्यस्थों के साथ इस बात पर सहमति बनी कि एक उच्च-स्तरीय समिति गठित की जाएगी, जो आदिवासियों और माओवादी समर्थकों द्वारा लगाए गए मानवाधिकार हनन के आरोपों की समीक्षा करेगी. लेकिन जानकार मानते हैं कि आईएएक का अपहरण अखबारों में छप रही नकारात्मक खबर और स्थानीय स्तर पर उठ रहे विरोध के बीच माओवादियों के लिए गले की हड्डी बन गई. जिसकी वजह से आखिरकार मेनन को तेरहवें दिन ताड़मेटला में दो मध्यस्थों बी.डी. शर्मा और प्रो. जी. हरगोपाल को सौंप दिया.






You May Also Like

error: Content is protected !!