जगदलपुर. जगदलपुर के संतोषी वार्ड में इस बार मां दुर्गा का पंडाल सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि बस्तर की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को करीब से देखने का अनूठा ठिकाना बन गया है. दक्षिण भारतीय फिल्म कांतारा की थीम पर तैयार इस पंडाल में बस्तर के स्थानीय देवी-देवताओं और प्रकृति से जुड़ी आस्था को खास अंदाज में दर्शाया गया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि पंडाल का लगभग 90 प्रतिशत निर्माण बांस से किया गया है. यही वजह है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन के साथ पंडाल की कलाकारी और अनूठी सजावट को देखने के लिए भी उत्साहित हैं.

नवयुवक श्री दुर्गा उत्सव समिति संतोषी वार्ड पिछले 28 वर्षों से हर साल अलग-अलग थीम पर पंडाल तैयार करती आ रही है. इस बार समिति के सदस्यों ने कुछ नया करने की सोची और कांतारा की थीम को बस्तर की स्थानीय संस्कृति के साथ जोड़ने का फैसला किया. पंडाल में पंजुरली देव और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताओं को दर्शाते हुए बांस से आकर्षक संरचना तैयार की गई है. समिति का उद्देश्य सिर्फ आकर्षक पंडाल बनाना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और पारंपरिक संस्कृति से जोड़ना भी है.

इस पंडाल की एक और खास बात है इसका निर्माण. जहां आमतौर पर पंडाल बनाने में प्लाई और दूसरे सजावटी सामान का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं यहां बांस को प्राथमिकता दी गई है. समिति के सदस्यों के मुताबिक शुरुआत में निर्माण के दूसरे विकल्पों पर विचार हुआ था, लेकिन बांस से कुछ अलग और बस्तर की पहचान से जुड़ा हुआ बनाने का निर्णय लिया गया. पश्चिम बंगाल के कारीगरों ने इस पंडाल को आकार दिया है. अब तक इसके निर्माण में लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं और सजावट का काम भी जारी है. पंडाल तैयार होते ही लोगों की भीड़ जुटने लगी.

समिति के सदस्यों के मुताबिक पहले ही दिन बड़ी संख्या में लोग इसे देखने पहुंचे. सोशल मीडिया पर रील बनाने वाले कंटेंट क्रिएटर और यूट्यूबर भी यहां पहुंच रहे हैं, जिससे पंडाल को लगातार पहचान मिल रही है. समिति को उम्मीद है कि इस बार श्रद्धालुओं की भागीदारी पिछले वर्षों से ज्यादा रहेगी.
समिति का कहना है कि बस्तर की संस्कृति प्रकृति, जमीन और स्थानीय देवी-देवताओं से गहराई से जुड़ी हुई है. बस्तर दशहरा भी इस सांस्कृतिक विरासत का बड़ा उदाहरण है. ऐसे में कांतारा जैसी लोकप्रिय फिल्म की थीम को बस्तर की परंपराओं के साथ जोड़कर पेश करने की कोशिश की गई है, ताकि मनोरंजन के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी बढ़ावा दिया जा सके. समिति ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे केवल एक पंडाल तक सीमित न रहें, बल्कि शहर के सभी दुर्गा पंडालों में पहुंचकर समितियों की मेहनत और उत्साह का सम्मान करें.
